कालिका माता की आरती
जय जय कालिका माता, जगतारिणी भवानी।
तेरे दर पे शीशे ढँढते, हरि भक्त सब ज्ञानी।।
अमल कमल तेरे चरणों में, भक्तों का संसार।
तेरी महिमा गाए सारा, जग में तेरा प्यार।।
शुम्भ-निशुम्भ संहारिणी, महिषासुर मर्दिनी।
त्रिशूल धारी दुर्गा, करुणा की सागरिणी।।
काली के रूप में तू है, भय का नाश करने वाली।
तू ही शक्ति, तू ही भक्ति, जय हो महाकाली।।
दुख में जो पुकारे, दुख उससे मिलता है।
भक्ति के कष्ट हरती, माँ सबका सहारा।
तेरे नाम का जो जपे, उसका जीवन सुधरे।
तेरे दर्शन पाते माँ, हर संकट से उबरे।।
आरती माँ की हम गाएँ, प्रेम से शीश नवाएँ।
कालिका माता की महिमा, सब मिलकर गुण गाएँ।।
कालिका माता की जन्म कथा
काली मैया के रूप में हुआ था, जिन्हें महाकाली के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में शक्ति और विनाश की देवी मानी जाती हैं। उनकी उत्पत्ति की कथा पुराणों में वर्णित है।
जब राक्षस शुम्भ और निशुम्भ ने तीनों लोकों में अत्याचार किया, तब देवताओं ने दुर्गा मां से सहायता की प्रार्थना की। दुर्गा माँ ने अपनी भृकुटि से काली का सृजन किया।
काली का रूप अत्यंत भयंकर था—उनका शरीर काला था, चार हाथ थे, और लाल जीभ बाहर निकली हुई थी। काली माया ने अपनी प्रचंड शक्ति से प्रभु का संहार किया। युद्ध के दौरान, उनकी क्रोधाग्नि से पृथ्वी कांपने लगी। तब भगवान शिव ने स्वयं को शांत करने के लिए अपने मार्ग में लेटा दिया।
काली मैया ने जैसे ही शिव को अपने मंच के नीचे पाया, वे तुरंत शांत हो गए और उनकी जीभ निकाल दी। यह उनका शान्त और करुणामयी रूप है। काली माया का यह रूप है कि वे बुराई और अज्ञानता का विनाश करते हैं और अपने भक्तों को हर संकट से मुक्त करते हैं। उनका यह चरित्र बताता है कि शक्ति और विनाश दोनों का संतुलन आवश्यक है और सत्य की सदा विजय होती है। सनातन से जुड़ी अन्य जानकारी के लिए यहां पर क्लिक करें



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