रावण रचित तांडव स्तोत्र, जिसे रावण का शिव तांडव स्तोत्र भी कहा जाता है, भगवान शिव की स्तुति में लिखा गया एक अद्भुत और प्रभावशाली स्तोत्र है। इसमें रावण ने भगवान शिव के तांडव नृत्य का वर्णन किया है। यह स्तोत्र संस्कृत में है और इसमें 16 श्लोक होते हैं।
शिव तांडव स्तोत्र के श्लोक
1. जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥1॥
2. जटाकटाहसंभ्रमभ्रमन्निलिंपनिर्झरी-
विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं॥2॥
3. धराधरेन्द्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर-
स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोदमानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगंबरे(क्वचिच्चिदंबरे) मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥3॥
4. जटाभुजंगपिंगलस्फुरत्फणामणिप्रभा
कदंबकुंकुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।
मदान्धसिंधुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥4॥
5. सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-
प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः।
भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः
श्रियै चिराय जायतां चकोरबंधुशेखरः॥5॥
6. ललाटचत्वरज्वलद्धनंजयस्फुलिंगभा-
निपीतपंचसायकं नमन्निलिंपनायकम्।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसंपदेशिरोजयालमस्तु नः॥6॥
7. करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्धनंजयाहुतीकृतप्रचंडपंचसायके।
धराधरेन्द्रनंदिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्ममं॥7॥
8. नवीनमेघमंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर-
त्कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः।
निलिंपनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः
कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः॥8॥
9. प्रफुल्लनीलपंकजप्रपंचकालिमच्छटा-
विदंबिकं बन्धूककं सुखं न विन्दति क्षणं।
विमुक्तमुक्तलम्बांध्धिमुक्तमुण्डमालधरः
महाकपालिसंपदां श्रियं जयातु शंकरः॥9॥
10. सशंखचक्रशाल्यां-शशिविशालशीवलिङ्गे
निषण्णं शांतिमिच्छन्नमित्तमात्रं मूर्धनि।
महार्घतं तृतीयकोटिसंपदे महेश्वरं
शिर:पतिं नमामहे मणिश्वरीस्वरूपिणम्॥10॥
11. कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरं
निरीक्षितान्धकोपदान्तवृन्ददण्डकृतय।
धृतास्पदं शिरीषचिन्तयाखिलग्रहाधिपः
चिराय नो वितुं धरामवेतु भूर्तिहारकः॥11॥
12. विजृंभणोज्ज्वलद्भुजंगजन्मदुःखसूनवः
कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः।
दुरासदस्य दुर्मदस्य दुर्गतस्य कर्मणः
कृपा न किं चिदस्तु मे विभोः प्रसन्नबोधकृत्॥12॥
13.महेश्वरो गुरुः साक्षात्त्रिपुरारिर्गणाधिपः
सुदुर्लभं विरज्य साक्षाच्छिवः शिवी भवानि च।
शिवाय नो भवत्वसौ कृपा न किं चिदस्तु मे
विभोः प्रसन्नबोधकृत्॥13॥
14. करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्धनंजयाहुतीकृतप्रचंडपंचसायके।
धराधरेन्द्रनंदिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्ममं॥14॥
15. हरं हरं महेशं च व्योमव्यापी च यो गुरुः
विधत्तु कृपया तस्मै नमः साक्षाच्छिवं प्रति।
हरं हरं महेशं च व्योमव्यापी च यो गुरुः
विधत्तु कृपया तस्मै नमः साक्षाच्छिवं प्रति॥15॥
16. धराधरेन्द्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर-
स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोदमानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगंबरे(क्वचिच्चिदंबरे) मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥16॥
शिव तांडव स्तोत्र का महत्त्व
1. शिव की स्तुति: यह स्तोत्र भगवान शिव की महिमा का गुणगान करता है, जिसमें उनकी शक्ति, सुंदरता और तांडव नृत्य का वर्णन किया गया है।
2. भक्ति और समर्पण:यह स्तोत्र शिव भक्तों के लिए भक्ति और समर्पण का प्रतीक है। इसे पढ़ने या सुनने से भक्तों की भक्ति और शिव के प्रति समर्पण और गहरा होता है।
3. शक्ति और साहस का प्रतीक: रावण ने इस स्तोत्र को अपने सामर्थ्य और साहस को प्रकट करने के लिए लिखा था। यह स्तोत्र शिव की असीम शक्ति और उनके तांडव नृत्य का प्रतीक है, जो सृष्टि के विनाश और पुनर्निर्माण का प्रतीक है।
4. रावण रचित तांडव स्तोत्र, जिसे रावण का शिव तांडव स्तोत्र भी कहा जाता है, भगवान शिव की स्तुति में लिखा गया एक अद्भुत और प्रभावशाली स्तोत्र है। इसमें रावण ने भगवान शिव के तांडव नृत्य का वर्णन किया है। यह स्तोत्र संस्कृत में है और इसमें 16 श्लोक होते हैं।
5. आध्यात्मिक उन्नति इस स्तोत्र का नियमित पाठ या श्रवण आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होता है। यह मन की शांति, समृद्धि और सकारात्मकता लाता है।
शिव तांडव स्तोत्र न केवल एक धार्मिक कृति है बल्कि एक साहित्यिक और काव्यात्मक रचना भी है, जो अपने पाठकों और श्रवणकर्ताओं को एक अद्वितीय अनुभव प्रदान करती है।: शिव तांडव स्तोत्र की भाषा और ध्वनि बेहद सुंदर और मधुर हैं, जिससे इसे पढ़ना और सुनना एक अद्वितीय अनुभव बनता है।
5. आध्यात्मिक उन्नति: इस स्तोत्र का नियमित पाठ या श्रवण आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होता है। यह मन की शांति, समृद्धि और सकारात्मकता लाता है। इसी प्रकार के सनातन संबंधी जानकारी के लिए यहां पर जाएं
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