दशहरा क्यों बनाया जाता है दशहरा कब बनाया जाता है

 
दशहरा -क्यों बनाया जाता है- दशहरा कब बनाया- जाता है

दशहरा क्यों बनता है दशहरा कब बनता है


दशहरा, जिसे विजयादशमी के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय संस्कृति में एक अत्यंत महत्वपूर्ण त्योहार है। यह केवल बुराई पर अच्छाई की महत्ता का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह धार्मिक और सांस्कृतिक बुराई की महत्ता को भी जोड़ता है। यह पर्व भारत के विभिन्न संप्रदायों में अलग-अलग संप्रदायों द्वारा मनाया जाता है, लेकिन इसके पीछे मुख्य कथा और भावना एक है - बुराई पर अच्छाई की विजय। इस ब्लॉग में हम दशहरा का महत्व, इसके रहस्य, कारण और संबंधित विभिन्न गहराईयों पर दृष्टि डालेंगे।


दशहरा पर्व का कारण


दशहरा का उत्सव मुख्य रूप से रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों से हुआ है। इसके पीछे की दो प्रमुख कहानियाँ हैं:


1. रामायण की कथा: रामायण के अनुसार, भगवान श्रीराम ने पत्नी सीता को राक्षसराज रावण के व्यवसाय से मुक्त कराने के लिए लंका पर चढ़ाई की थी। लंका के राजा रावण ने देवी सीता का अपमान किया था और उन्हें अपनी राजधानी बनाया था। श्रीराम ने हनुमान, लक्ष्मण और वानर सेना की सहायता से रावण को हराया और सीता को वापस लाया। रावण का वध आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को हुआ था, इसलिए इस दिन को विजयादशमी कहा जाता है। यह कथा हमें सिखाती है कि गद्दाहाट कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः सत्य और अच्छाई की ही विजय होती है।



2. महाभारत की कथा: महाभारत के अनुसार, पांडवों ने कौरवों के युद्ध के बाद अपनी निर्वासन अवधि समाप्त कर ली थी। इस युद्ध में अर्जुन ने अपने दिव्य धनुर्धर को एक शमी वृक्ष के नीचे छिपाया था। विजयादशमी के दिन उन्होंने इसे पुनः प्राप्त किया और कौरवों पर विजय पाई। इस प्रकार, यह दिन शक्ति और साहस का प्रतीक माना जाता है।




दशहरा का महत्व


दशहरा का महत्व केवल धार्मिक नहीं है, बल्कि यह नैतिक और सांस्कृतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। यह त्यौहार हमें जीवन के कई महत्वपूर्ण संदेश देता है:


1. बुराई पर अच्छाई की जीत: दशहरा हमें सिखाता है कि जीवन में कितनी भी मुश्किलें क्यों न हों, अगर आप सच्चाई और अच्छाई के मार्ग पर हैं, तो अंत में आपकी जीत निश्चित है।



2. साहस और संघर्ष का प्रतीक : भगवान राम ने रावण को परास्त करने के लिए वर्षों तक युद्ध किया। यह हमें सिखाया जाता है कि किसी भी बुराई या चुनौती पर विजय पाने के लिए साहस और कर्तव्य की आवश्यकता होती है।



3. धर्म और सत्य की प्रतिष्ठा : विजयादशमी धर्म और सत्य की जीत का प्रतीक है। यह हमें याद दिलाता है कि सत्य और धर्म के मार्ग पर चलना जीवन में आने वाली चुनौतियाँ आसान हो जाती हैं।  सनातन से जुड़ी हुई विभिन्न जानकारी के लिए कृपया यहां पर जाएं




दशहरा से जुड़ी परंपराएँ


भारत के विभिन्न संप्रदायों में दशहरा को अलग-अलग साँचे और रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। इनमें से कुछ प्रमुख परम्पराएँ निम्नलिखित हैं:


1. रावण दहन: उत्तर भारत में दशहरा का मुख्य आकर्षण रावण, मेघनाद और कुम्भकर्ण के पुतलों का दहन है। यह विशिष्ट रूप से बुराई के अंत और अच्छे की जीत का प्रतिनिधित्व करता है। लोग बड़े उत्साह के साथ रावण दहन को देखने के लिए सामूहिक रूप से शामिल होते हैं और इस दौरान विभिन्न नाट्य प्रस्तुतियां भी आयोजित की जाती हैं, जिनमें प्रमुख लोग शामिल होते हैं।



2 . दशहरे के दिन से पहले होती है दशहरे के दसवें दिन की शुरुआत। फेमेस में रामायण की कथा को नाटकीय रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसका उद्देश्य दर्शकों को भगवान राम के जीवन से जुड़ी नैतिक शिक्षा की शिक्षा देना है। विजयादशमी के दिन रावण वध के साथ बांग्लादेश का समापन होता है।



3. शस्त्र पूजा: भारत के कई आदर्शों में दशहरा के दिन शस्त्रों की पूजा की जाती है। यह पारंपरिक महाभारत के अर्जुन से प्राप्त हुआ था, इसी दिन के शस्त्र पुनः प्राप्त हुए थे। इस पूजा का उद्देश्य यह संदेश देना है कि शक्ति का सही उपयोग किया जाना चाहिए और उसे धर्म के मार्ग पर ही अनुकूल बनाना चाहिए।



4. विजय यात्रा: दक्षिण भारत में, विशेष रूप से कर्नाटक के मैसूर में, दशहरा को सबसे बड़ी विजय यात्रा के रूप में मनाया जाता है। यहां विजय यात्राएं निकाली जाती हैं, जिनमें भव्य हुंकारियां, हाथियों की सवारियां और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां शामिल होती हैं।




दशहरा के धार्मिक और सामाजिक शुभचिंतक


दशहरा का धार्मिक महत्व तो स्पष्ट है, लेकिन इसका सामाजिक महत्व भी बहुत महत्वपूर्ण है। दशहरा के दौरान विभिन्न कलाकार और समूह के लोग एक साथ आते हैं और समूह को यह पसंद आता है। यह एकता और सामूहिकता का प्रतीक है। इसके अलावा, इस त्योहार के माध्यम से नैतिक शिक्षा भी दी जाती है। बच्चों और बच्चों को सिखाया जाता है कि जीवन में सच्चाई और धर्म के मार्ग पर चलना ही सही है और बुराई का अंत निश्चित है।


दशहरा का आधुनिक संदर्भ


आज के समय में दशहरा में केवल धार्मिक उत्सव नहीं रखा गया है, बल्कि यह हमारे जीवन के विभिन्न सिद्धांतों में अच्छाई और बुराई की पहचान का प्रतीक बन गया है। इस त्योहार में हमें यह सिखाया जाता है कि हमें अपने अंदर की बुराइयों को पहचानना और दूर करना चाहिए। गुस्सा हो, प्यास हो, या किसी अन्य प्रकार की नकारात्मकता हो, दशहरा प्रेरणा हमें सुझाव देती है कि हम अपने जीवन में सकारात्मकता लाएँ और अपने आस-पास के लोगों के साथ प्रेम और निर्देशित पूर्ण व्यवहार करें।


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दशहरा एक ऐसा पर्व है जो हमें जीवन के लिए मोक्ष का पाठ पढ़ाता है। यह धर्म की जीत, धर्म की प्रतिष्ठा और सत्य के महत्व का प्रतीक है। यह पर्व न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। दशहरा हमें याद दिलाता है कि बेकार जीवन में इतनी कठिनाइयाँ क्यों नहीं आतीं, अगर हम सत्य और धर्म के मार्ग पर हैं, तो अंत में जीत हमारी ही होगी। इस पर्व के माध्यम से हम अपने जीवन में सकारात्मकता और वैभव को स्थान दे सकते हैं।


दशहरा का संदेश हमेशा हमारे जीवन का हिस्सा बने रहना चाहिए, ताकि हम एक बेहतर समाज और जीवन का निर्माण कर सकें।


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